मन की निर्धनता Inspirational Moral Story

मन की निर्धनता Inspirational Moral Story

रवीन्द्रनाथ टैगोर जब कभी ग्वाल मंडी स्थित अमृत धारा भवन आकर ठहरते, उनके शुभेच्छुओं का तांता लग जाता। लोग उनसे तरह-तरह के प्रश्न करते। वहां एक युवक रोज मुंह लटकाए आता और पीछे बैठ जाता। एक दिन टैगोर ने उससे पूछा- ‘तुम इस तरह उदास क्यों रहते हो?’ कुछ कहते क्यों नहीं।’ युवक ने कहा- ‘मैं बहुत निर्धन हूँ गुरुदेव।’ टैगोर बोले- ‘तुम मुझे एक आँख दे दो, मैं तुम्हें एक लाख रूपये दे दूंगा।’ युवक बोला – ‘यदि मैं एक आँख दे दूँ तो मैं काना हो जाऊँगा।’ इस पर टैगोर ने कहा- ‘तुम्हारे पास दो हाथ और दो पैर भी हैं। यदि तुम इनमें से कुछ भी दे दो तो मैं तुम्हें मुंहमांगी कीमत दूंगा।’ युवक बोला- मैं ये अंग कैसे दे सकता हूँ। ये मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण हैं।’ टैगोर मुस्कुराए और बोले- ‘जब तुम्हारे पास इतनी महत्वपूर्ण चीजें हैं, और इतनी कीमती चीजों के तुम मालिक हो, तब तुम अपने को निर्धन कहकर अपना मजाक क्यों उड़ाते हो।’ युवक उनका आशय समझ गया।

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